आखिर अपने पहाड़ी ही क्यों हो रहे अपनों के विरोधी !

आखिर अपने पहाड़ी ही क्यों हो रहे अपनों के विरोधी !

पहाड़ के लोगों के लिये ये कहावत पता नहीं कब और कैसे चर्चा में आ गयी और धीरे धीरे पर्वतीय समाज का अकाट्य तथ्य बन चुकी है कि ये लोग एक गहरे बर्तन में कैद उन केकड़ों की तरह हैं जिन्हें भरोसे के साथ बिना ढक्कन लगाये कैद रखा जा सकता है। वजह है केकड़ों की वो मानसिकता जिसके चलते बर्तन से बाहर निकलने वाले केकड़े को खुद उसकी जात बिरादरी के लोग टांग पकड़ कर वापस बर्तन में खींच लेते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण पर्वतीय समाज में बिखरे पड़े हैं जिन्हें अपने समाज का मान सम्मान तब तक हासिल नहीं हुआ जब तक कि बाहरी लोगों ने उनकी कद्र करनी शुरू नहीं की।

हमारे साइंटिस्ट हों, कलाकार हों, कवि हों, लेखक हों या फिर पत्रकार जिसने बाहर जाकर नाम कमाया उसे हमने सिर आंखों पर बिठाया और उसके साथ अपना नाम जोड़ कर गौरव की अनुभूति करने में देर नहीं की। लेकिन जब वो अपनी प्रतिभा के दम पर उत्तराखंड की सेवा के लिये तत्पर हुआ तो अपने ही लोग ये सवाल करने से नहीं चूके कि आखिर वो ही क्यों, हम क्यों नहीं। ये सवाल यूपी का हिस्सा रहते हुए और आज अलग राज्य बनने के सत्रह साल बाद भी कायम है कि आखिर हमें अपने ही लोगों की तरक्की क्यों रास नहीं आती।

राज्य में पिछले सत्रह सालों में बीजेपी और कांग्रेस की सरकारों में मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकारों को लेकर राज्य के पत्रकारों के एक खास तबके में वो खिंचाव कभी नहीं देखने को मिला जो इस बार मुख्यमंत्री के सलाहकार के पद पर पहाड़ी मूल के दिल्ली में स्थापित युवा पत्रकार रमेश भट्ट की तैनाती के बाद से लेकर अब तक देखने को मिल रहा है।

रमेश भट्ट की पहचान उत्तराखंड में नयी भूमिका में आने से पहले तक एक स्पष्टवादी, विश्लेषणात्मक और शोध-आधारित टीवी एंकर और रिपोर्टर के तौर पर रही है। जाहिर है कि बीजेपी के नये मुख्यमंत्री के तौर पर त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तराखंड मूल के एक पत्रकार को अपने मीडिया सलाहकार के तौर पर नियुक्त करने से पहले उन की वैचारिक सोच और दूसरे पहलुओं पर भी जरूर ध्यान दिया होगा लेकिन क्या इससे पहले किसी मुख्यमंत्री ने इन पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया होगा। अगर तब मुख्यमंत्री के दरबार में बाहरी लोगों के बढ़ते प्रभाव पर कोई सवाल नहीं उठा तो अब क्यों उठ रहे हैं।

उत्तराखंड राज्य के इतिहास में मात्र तीन महीने के मीडिया सलाहकार उमाकांत लखेड़ा के बाद किसी मुख्यमंत्री के विशुद्ध पहाड़ी पत्रकार के तौर पर मीडिया सलाहकार बनने का गौरव रमेश भट्ट को जाता है। लेकिन इसे लेकर पहाड़ के कुछ स्वनामधन्य बुद्धिजीवियों और पत्रकारों में इतनी बेचैनी क्यों है। क्या इसकी वजह येन केन प्रकारेण सत्ता की मलाई चाटने की उनकी अति महत्वाकांक्षा में मुख्यमंत्री के इस फैसले से हुए तुषारापात की कसक तो नहीं। वर्ना मीडिया सलाहकार और सूचना आयुक्त जैसे पदों को हासिल करने के लिये उनकी बेताबी इस तरह जगजाहिर नहीं होती।

क्यों नहीं पर्वतीय राज्य के ऐसे दिग्भ्रमित पत्रकारों ने आलोचना और साजिशों की बजाय रमेश भट्ट के पत्रकारीय अनुभव का लाभ लेते हुए बाहरी लोगों के जाल में फंसे सूचना विभाग को चुस्त – दुरुस्त करने के अलावा दुर्गम पहाड़ों में काम कर रहे श्रमजीवी पत्रकारों की समस्याओं को उजागर करने की कोशिश नहीं की। दरअसल इसकी वजह वही तथाकथित पत्रकार हैं जो आज भी सत्ता की चाटुकारिता से हासिल निजाम को बनाये रखने की जद्दोजहद में लगे हैं और नहीं चाहते कि उनसे ये हक कोई ईमानदार पत्रकार छीन ले भले ही वो उनका अपना ही क्यों ना हो।

पत्रकार के तौर पर रमेश भट्ट ने राष्ट्रीय मीडिया में अपनी मेहनत से जो पहचान बनायी उसमें उनकी पर्वतीय पृष्ठभूमि का भी स्वाभाविक योगदान है और इस नाते उनसे इस क्षेत्र के लोगों की उम्मीदें भी जरूर ज्यादा हैं लेकिन जब उन्हें राज्य के लिये कुछ करने का मौका मिला तो कुछ लोगों ने गाहे बगाहे जैसे उनकी कार्यक्षमता पर सवाल दागने की सुपारी ही ले ली है।

ये सुपारी पत्रकारिता इस पर्वतीय राज्य के पढ़े लिखे विचारशील लोगों की पहचान तो कभी नहीं रही। तो फिर आखिर ये लोग कौन हैं जो अपनी पीत पत्रकारिता को वैचारिक विरोध का नाम देने की कोशिश कर रहे हैं। जो पत्रकार दूसरों की बंदूक के लिये अपने कंधे का इस्तेमाल आज अपने छोटे स्वार्थों के लिये होने दे रहे हैं वो याद रखें कि कल उसी बंदूक के निशाने पर वो भी हो सकते हैं। सच तो ये है कि ये केकड़ा मानसिकता ही रोजी रोटी की तलाश में पलायन कर सफलता के पायदान चढ़ चुके कई पहाड़ी लोगों की घर वापसी की राह में आज सबसे बड़ा रोड़ा बन चुकी है।

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