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16 जून की उस रात से कितना बदला उत्तराखंड?

एकाएक ख़बरों में छाने वाला था उत्तराखंड
क्या पता था ये शांत प्रदेश एकाएक देश-विदेश की ख़बरों में छाने वाला है। उस साल मौसम ने उत्तराखंड में अचानक से करवट ली थी। वैसे तो अधिकांश जून महीने में नॉन स्टॉप बारिश शायद ही प्रदेश में कभी हुई होगी लेकिन उस साल मेघ खूब बरस रहे थे। हमेशा की तरह उस साल भी उत्तराखंड के चारों धामों में भक्तों की भारी भीड़ थी। केदारनाथ-बदरीनाथ-गंगोत्री और यमुनोत्री, हर जगह भक्तों का सैलाब उमड़ा था। इस बीच लगातार हो रही भारी बारिश से केदारनाथ के ऊपर बनी झील तेज़ी से ना केवल भरी बल्कि थोड़ा-थोड़ा रिसने लगी थी। तभी गांधी सरोवर में ग्लेशियर का बड़ा टुकड़ा गिरने से वो अचानक फट गयी।

 टूटा था चोराबारी ग्लेशियर

अचानक केदारनाथ में पानी-पानी होने लगा। दुकान-मकान-धर्मशाला-होटल सब धीरे धीरे डूबने लगे। बताया जाता है कि उस रात केदारनाथ में लगभग 10 हजार से ज्यादा भक्तों की भीड़ जमा थी। जल सैलाब को केदार में रुके लोग जबतक समझ पाते तबतक बहुत देर हो चुकी थी। इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढहने लगी थीं। पानी के उस बहाव के साथ मलबा बड़े-बड़े पत्थर ला रहा था। चारों तरफ चीख पुकार और भगदड़ मची हुई थी।

सरकार को लगी थी देर से खबर
उत्तराखंड की राजधानी में बैठे राजनेताओं और अधिकारियों को जबतक वहां के हालातों की खबर लगती तबतक बहुत देर हो चुकी थी। लगभग 40 घंटे बाद सरकारी अमला वहां पहुंचा लेकिन तबतक वहां सब कुछ तबाह हो चुका था। लोगों की लाशें पत्थर हो चुकी थीं।

एक आंकड़े के मुताबिक, लगभग 5 हजार लोगों ने इस घटना में दम तोड़ा था। हालांकि, सरकार अभी भी 4 हजार लोगों को ही गुमशुदा मानती है।

हर जगह था मातम ही मातम
ऐसा नहीं है कि गांधी सरोवर से निकली इस जल प्रलय ने सिर्फ केदारनाथ को तबाह किया था बल्कि नीचे उतरने के बाद गांव के गांव अपने साथ ले गयी थी वो प्रलय। कई हजार लोग बेघर हो गए। कई सड़कें, स्कूल, बिजली घर, पुल कुछ भी तो नहीं छोड़ा था जल के इस रौद्र रूप ने। रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी, ऋषिकेश, हरिद्वार और गढ़वाल सहित कुमाऊं के हर हिस्से से लोगों की मरने और गायब होने की खबरें आ रही थीं।

सेना ने चलाया था देश का सबसे बड़ा ऑपरेशन
कहा जाता है केदारनाथ की तबाही में देश का सबसे बड़ा और कठिन ऑपरेशन चलाया गया था। कठिन रास्ते और टूट चुके उत्तराखंड में सेना, वायुसेना, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ सहित तमाम एजेंसियों ने उत्तराखंड में फंसे लोगों को बचाना शुरू कर दिया था। लगभग 15 दिन से ज्यादा चले इस ऑपरेशन में 1 लाख से ज्यादा लोगों को बचाया गया था।

ये बचाव कार्य यूं ही नहीं हुआ। इसमें ना जाने कितने ही सैनिकों की शहादत हुई और ना जाने कितने कठिन हालातों में काम करते हुए हमेशा के लिए अपाहिज हो गए।

आज भी अपनों को तलाश रहे हैं लोग
केदारनाथ की इस जलप्रलय ने देशभर से आये भक्तों को मौत के घाट उतार दिया लेकिन आज भी कई लोग इस आस में केदारनाथ-बदरीनाथ-हरिद्वार और ऋषिकेश आते हैं शायद कहीं घूमते हुए या रास्ते में उन्हें अपने मिल जायें।

जिनके शव नहीं मिले वो हैं लापता
केदार प्रलय में सरकारी आंकड़े बताते हैं कि आज भी लगभग 4 हजार से ज्यादा लोग लापता हैं। इनको इसलिए मृतक नहीं माना जा सकता क्योंकि हमारा कानून कहता है कि 7 सालों में उनका शव नहीं मिल जाता तबतक उनके मृत नहीं माना जा सकता और शायद यही कारण है कि आज भी उत्तराखंड सरकार की फाइलों में कई हजार गुमशुदा लोगों के नाम हैं। इसी आस में आज भी लोग उत्तराखंड का रुख करते हैं, ये सोचकर कि क्या पता किस गांव, किस शहर में उनके खोये हुए अपने मिल जायें।

हालांकि, सरकार अब आगे बढ़ रही है। सरकार का कहना है कि वो जख्म तो शायद कभी ना भर पायें लेकिन अब इस तरह की आपदा ना आये इसके लिए बहुत हद तक प्रयास किये गए हैं।

जनहानि के साथ क्या-क्या नुकसान राज्य को हुआ-

  • इस आपदा में 4200 गांव डिस्कनेक्ट हो गए थे जबकि 13 एनएच हाइवे पूरी तरह ध्वस्त हो गए थे।
  • 35 राज्य सड़कें खत्म हो गयी थीं तो 2385 सड़क जिला और ग्रामीण सड़क भी आपदा की भेंट चढ़ गई थीं। पानी के सैलाब ने 172 पुल टूटे और बहे थे।
  • 4 सालों में सरकार ने अबतक 215 सड़कों के निर्माण करने के लिए 726.71 करोड़ रुपये जारी किए हैं।
  • इन सड़कों की लंबाई 1494 किलोमीटर है जबकि 26 पुल बनकर तैयार हैं जिसमें 148.26 करोड़ रुपये का काम हो चुका है।
  • इसी तरह अबतक 135 ठेके (838.38 करोड़ रुपये) PWD की तरफ से दिए जा चुके हैं।
  • इस आपदा में करीब 9 लाख लोग प्रभावित हुए थे, 3 हजार 320 घर बहे और टूट गए थे।
  • सरकार ने अबतक 2 हजार 499 घरों का निर्माण करवाया है।

सरकार ने लिया सबक
इतनी बड़ी आपदा के बाद सरकार का कहना है कि उनकी तरफ से सबक लेते हुए कई तरह की चीजें नई की गई हैं। सरकार अब क्षमता विकास पर काम कर रही है। सरकार की तरफ से डिजिटल डाटा बैंक बनाया गया है, जिसमें संवेदनशील इलाकों की जानकारी होती है। नदियों का रुख जानने के लिए अलग से बजट जारी किया गया है। इसके साथ ही संवेदनशील 450 गांवों का सर्वे करवाया गया है जिसके लिये जिलाधिकारियों को निर्देश दिये गए हैं।

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