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नौकरी छोड़ स्लम के बच्चों को बना रही हैं काबिल

अमेरिकी दार्शनिक जॉन डेव के मुताबिक शिक्षा जीवन की तैयारी नहीं, बल्कि शिक्षा ही जीवन है। यही वजह थी कि मुंबई (Mumbai) में रहने वाली अफसाना परवीन (Afsana Parveen) ने अपनी नौकरी छोड़ ऐसे बच्चों को शिक्षित करना शुरू किया जो पढ़ना चाहते थे। उन्होने महसूस किया कि ज्यादातर अपराधों में ऐसे लोग शामिल होते हैं जो कम पढ़े लिखे होते हैं। इसलिये बच्चों को पढ़ाने की शुरूआत उन्होने स्लम में रहने वाले बच्चों (children living in slums) के साथ की और वो भी बिना किसी मदद के, लेकिन आज अफसाना अपनी संस्था ‘पहचान लाइफ फाउंडेशन’ (Pehchan Life Foundation) की मदद से बच्चों को पढ़ा रही हैं उनको इस काबिल बना रही हैं कि वो अपने पैरों पर खड़े हो सकें। इन बच्चों को पढ़ाई के साथ साथ वो कंम्प्यूटर भी सीखाने (computer education) का काम कर रही हैं।

मुंबई (Mumbai) की रहने वाली अफसाना परवीन (Afsana Parveen) मूल रुप से बिहार (Bihar) की रहने वाली हैं। 12वीं की पढ़ाई के बाद वो दिल्ली (Delhi) की एक एनजीओ के साथ काम करने लगी। ये संस्था गरीब बच्चों की शिक्षा (poor children’s education) के लिए काम करती थीं। इसी दौरान जब उनकी शादी हो गयी तो वो मुंबई (Mumbai) आकर रहने लगीं। इस दौरान भी वो समाज से जुड़े काम करती रहीं। दूसरों की तरह अफसाना को भी निर्भया केस (Nirbhaya case) ने बुरी तरह हिलाकर रख दिया था। इस घटना के बाद वो काफी विचलित हो गयी। उन्होने इस केस का गहराई से अध्ययन किया तो उन्हें पता चला कि इस अपराध को करने वाले एकदम नीचले तबके से आते हैं। साथ ही इन लोगों में शिक्षा का भी काफी अभाव है। निर्भया के केस (Nirbhaya case) के बाद चाहे गुड़िया के केस या फिर उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बलात्कार केस सब में एक ही समानता थी कि इसे करने वाले सभी लोग नीचले तबके के और कम पढ़े लिखे थे। अफसाना ने इसके बाद फैसला किया कि वो इस तबके को शिक्षित करने का काम करेंगी। इस काम में उन्हें अपने पति का पूरा सहयोग मिला। उनका कहना था कि घर खर्च वो चला लेंगे। इसके बाद से अफसाना ने दिल्ली, लखनऊ और दूसरे कई शहरों का दौरा किया। अफसाना बताती हैं कि

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के दूरदराज के इलाकों का दौरा करने पर मैने देखा कि यहां के लोग शिक्षा को बिल्कुल भी जरूरी नहीं मानते हैं। खासतौर पर लड़कियों के लिए तो उनका कहना था कि शादी के बाद उन्हें घर संभालना है। इसके लिए पढ़ाई की कोई जरूरत नहीं होती है।

इसी बीच दिल्ली (Delhi) की एक राजनैतिक पार्टी के प्रचार के दौरान वो दिल्ली के कई स्लम में गयी। यहां पर उन्होने देखा कि एक एनजीओ यहां के रेहड़ी पटरी और स्लम के कल्याण के लिए बहुत अच्छा काम कर रही हैं। यहीं से उन्हें लगा कि अब उन्हें भी ऐसे लोगों के लिए कुछ करना चाहिए। मुंबई (Mumbai) में काम के दौरान ही एक दिन शाम को जब वो घर लौट रही थीं तो रास्ते में उनको नवीं मुंबई के घनसोली फ्लाईओवर के नीचे कुछ बच्चे स्कूली ड्रेस में दिखाई दिये। अफसाना वहां रूकी और उन बच्चों के पास गई। अफसाना ने उन बच्चों से कहा कि वो उन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना चाहतीं हैं क्या वो उनसे पढ़ना चाहेंगे? सभी बच्चे इसके लिये खुशी खुशी तैयार हो गये। उसके बाद अफसाना ने उन बच्चों को रोजाना पढ़ाना शुरू कर दिया। यहां रहने वाले बच्चे अपनी पढ़ाई को लेकर काफी जागरूक थे। यही वजह थी कि दूसरे दिन से ही उनके पास 30 से भी ज्यादा बच्चे आने लगे। ये देखकर अफसाना को महसूस हुआ कि इतने ज्यादा बच्चों को वो अकेले नहीं संभाल सकेंगी। इसके लिए उनको और टीचरों की जरूरत पड़ेगी, लेकिन नौकरी की वजह से कोई भी इन बच्चों के दिन में पढ़ाने के लिए तैयार नहीं हुआ। तब उन्होने बच्चों को दिन की बजाय रात में 8 बजे से 9बजे तक पढ़ाना शुरू किया।

इसके बाद वहां पर बच्चों की संख्या बढ़कर करीब 70 तक पहुंच गई। जिसके बाद इन बच्चों को उनकी क्लास के मुताबिक अलग-अलग ग्रुप में पढ़ाया जाने लगा। इन सभी बच्चों को  फुटपाथ पर स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ाया जाता था। कुछ समय बाद जब बस्ती में लाइट का इंतजाम हो गया तो अफसाना ने यहां पर दो तीन कम्प्यूटर लगवा दिये। जहां पर बच्चों को कम्प्यूटर की शिक्षा (computer education) दी जाने लगी। बच्चे कम्प्यूटर सीखने के लिए काफी उत्सुक रहते थे। ये देखकर अफसाना ने उनसे कहा कि जो बच्चे हर हफ्ते पूरे दिन क्लास में आयेंगे उनको ही कम्प्यूटर चलाने को मिलेगा।

मेरी छोटी सी कोशिश से यहां रहने वाले बच्चों को काफी कुछ सीखने को मिला। ये बच्चे पढ़ने में अच्छे थे और जिंदगी में कुछ करना चाहते थे। साथ ही बच्चों को पढ़ता देख बस्ती और उसके आसपास रहने वाले लोगों ने खुलेआम शराब पीना बंद कर दिया। वहीं लोगों का आपस में लड़ाई झगड़ा भी कम हो गया था।

अफसाना जिस बस्ती में पढ़ाने का काम करती थी वो अवैध थी। इसलिये बीएमसी ने वहां पर बुलडोजर चला दिया। इस तोड़फोड़ के दौरान वहां रखे तीनों कम्प्यूटर टूट गये। दरअसल अफसाना ये काम उस समय अकेले कर रही थीं, इसलिये वो इसका ज्यादा विरोध भी नहीं कर पाईं। इस घटना के बाद अफसाना ने बस्ती के पास एक कमरा किराये पर लिया और वहां पर एक बार फिर कम्प्यूटर लगाये। बच्चों को पढ़ाने का काम पहले की ही भांति फुटपाथ पर ही जारी रहा। इस समय घनसोली की इस जगह पर 50 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए रोजाना 5 वालंटियर आते हैं। ये बच्चे कक्षा एक से 8वीं तक के हैं। सोमवार से शनिवार तक इन बच्चों को स्कूली पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है, जबकि रविवार को इनकी ग्रुमिंग क्लासेज चलती हैं। जिसमें बच्चों को डांस, गाना, पेंटिंग और क्रॉफ्ट जैसी एक्टिविटी कराई जाती है। जो बच्चे डांस और सिंगिंग में अच्छे हैं उनका दाखिला ये खुद अपने खर्चे पर प्राइवेट स्कूलों में कराते हैं।

पहचान लाइफ फाउंडेशन’ (Pehchan Life Foundation) इस समय तीन क्षेत्रों में काम कर रही हैं। ये हैं शिक्षा, हेल्थकेयर और स्पोटर्स। हेल्थकेयर में ये संस्था मेडिकल कैंप लगाकर लोगों की स्वास्थ्य जांच करती हैं। मुंबई (Mumbai) में तो इन्होने टीबी और एड्स जैसी बीमारियों की जांच कराई। मुंबई में इस समय घनसोली के अलावा वासी में भी एक सेंटर चल रहा है। इसके अलावा दिल्ली, गुड़गांव और बिहार में भी कई सेंटर चल रहे हैं। अफसाना बताती हैं कि बिहार (Bihar) में तो हमें सोशल मीडिया की मदद से इतना अच्छा रिस्पांस मिला है कि हमारे कुछ सेंटर में 100 से भी ज्यादा बच्चे हैं। बिहार के रोहतास में हमारे तीन सेंटर हैं जबकि मुंगेर में दो सेंटर काम कर रहे हैं। अफसाना की कोशिशों से बस्ती में रहने वाले बच्चों की पढ़ाई में काफी सुधार आया है। खासतौर पर अंग्रेजी, गणित और साइंस विषयों में। सेंटर में आने वाले बच्चों से सबसे पहले उनका होमवर्क और क्लासवर्क के बारे में पूछा जाता है। अगर कोई बच्चा उस दिन स्कूल नहीं जाता है तो उससे ना जाने की वजह पूछी जाती है। बच्चा सही बोल रहा है कि गलत इसकी भी वालंटियर और अफसाना खुद जांच करते हैं। कई बार अफसाना खुद बच्चों के स्कूल में जाकर पता करती हैं कि बच्चे स्कूल आ रहें हैं कि नहीं। साथ ही ये बच्चे अब सफाई से रहना सीख गये हैं। बड़ी लड़कियों को यहां पर माहवारी और दूसरी चीजों के बारे में भी जानकारी दी जाती हैं।​

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