लोकतंत्र, भीडतंत्र और गणतंत्र का 67वां साल

(मोहन भुलानी )

संविधान अपने जन्म के 67 वर्षों बाद भी “प्रस्तावना” को खोज रही है , देश में समानता कहीं दिखाई नहीं देती । प्रजातंत्र के चारों स्तंभ विधायिका , कार्यपालिका , न्यायपालिका और मीडिया जगत को अनैतिक आचरण और भ्रष्टाचार दीमक की तरह चांट रही है । देश के 1% अमीरों के पास 73% संपदा है । सम्प्रदायवाद-जातिवाद चरम में है । तब क्या कभी ऐसे युवा का मानसिक विकास संभव है जो किसी जाति-सम्प्रदाय में जन्म लेता हो और उसी में मर जाता हो ? हमारे युवा मस्तिष्क को पाखण्डी नेताओं और पूंजीपतियों ने गुलाम बना लिया है ।

चुनाव के समय “सोसल इंजीनियरिंग” के गणित में समाज में जातीय जहर घोलकर सत्ता हासिल करते हैं । चुनाव का आधार ही जाति-सम्प्रदाय हो गया है । ये कैसी धूर्तता है , संविधान कुछ और कहता है ,नेता करते कुछ और हैं । जाति-पंचायतें / खाप-पंचायतों के मुखिया कभी हत्यारे , शराबी-जुंआड़ी , शराब माफिया , भ्रष्टाचारियों का बहिष्कार नहीं करते , सब जानते हुए भी नेताओं के पायलग्गी करते हैं । लेकिन अगर कोई युवा अंतरजातीय विवाह कर ले तो तुरंत सामाजिक बहिष्कार / हुक्का पानी बंद / आर्थिक दण्ड का फरमान जारी कर देते हैं । युवा किंकर्तव्यविमूढ़ जातीय विषमता का दंश झेल रहा है । गजब का माहोल है देश में । ऐसी विषम परिस्थिति में ” एक मानव समाज ” उन सभी युवाओं की आवाज बन रहा है जो देश में छुआछूत, ऊंच-नीच , जातीय विषमता , साम्प्रदायिकता को खत्म कर “जातिमुक्त-साम्प्रदायमुक्त भारत” का निर्माण करना चाहते हैं।

*सामाजिक आंदोलन  के अगुआ बनना चाहते हैं । एक मानव समाज उन सभी युवाओं से आह्वान कर रहा है कि आओ जाति की दीवारों को ढहा देवें , जातीय भेदभाव के खिलाफ जोरदार आवाज उठायें । अगर विवाह करना है तो अपनी जाति से बाहर दूसरी जाति में विवाह करें । विरोध होने पर मां-बाप एवं परिवार के अन्य सदस्यों को समझायें …… नहीं तो बगावत करें… संविधान आपके साथ है ।

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