15,500 करोड़ का चूना लगाकर दिवालिया हुई एयरसेल

नई दिल्ली:  पीएनबी घोटाले का मामला अभी ठंडा नहीं पड़ा था कि एक दूसरा मामला सामने आया है। दरअसल, टेलीकॉम कंपनी एयरसेल के बारे एक बड़ा खुलासा हुआ है। एयरसेल कंपनी ने हिंदुस्तान को करोड़ों का चूना लगाया है। NTI एक्सलूसिव रिपोर्ट में इस कंपनी से जुड़े बैंकिंग घोटाले के बारे में बड़ा खुलासा किया है। एयरसेल ने भारत के 15,500 करोड़ रुपये डकार कर खुद को दिवालिया घोषित कर दिया है। इसका मतलब यह है कि एयरसेल कंपनी कई बैंकों का अरबों रुपया अब नहीं देगी।

कंपनी ने मुंबई में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में 28 फरवरी को खुद को दिवालिया घोषित करने के लिए आवेदन दिया था जिसे एनसीएलटी ने मंजूर कर लिया है। एयरसेल के दिवालिया होने की खबर को इस तरह समझे कि हिंदुस्तान के खजाने से 15 हजार करोड़ रुपये पानी में डूबते नजर आ रहे हैं क्योंकि बैंकों के पास एयरसेल की कोई भी ऐसी संम्पत्ति नहीं है जिसे बैंक बेचकर कर्ज की भरपाई कर सके।

आपको बता दें कि इस केस की जांच की तो पता चला कि यह केस नीरव मोदी और विजय माल्या से कई गुना बड़ा है। इसमें एयरसेल के मालिक आनंद कृष्णन जोकि मलेशियाई नागरिक हैं। उन्होंने हमारे सिस्टम का इस कदर शोषण किया कि यह किसी घोटाले से कम नहीं हैं।’

‘कंपनी को 2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर मिला था। टेलिकॉम डिपार्टमेंट के नियमों के अनुसार इस स्पेक्ट्रम को कोई और बेच नहीं सकता और इसकी संपत्ति 3 जी स्पेक्ट्रम बची है जो कंपनी ने साल 2010 में 6500 करोड़ रुपये में 20 साल के लिए खरीदी थी। जिसका एक तिहाई लाइसेंस की अवधि खत्म हो चुकी है। तो आज उसकी कीमत 4000 हजार करोड़ रूपये से ऊपर नहीं है।’

एयरसेल कंपनी ने 2009 में भारतीय स्टेट बैंक समेत कंसोर्शियम और स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक से 14,300 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। तब एयरसेल ने बैंकों के पास 2जी स्पेक्ट्रम की गारंटी रखी थी जिसकी तब कीमत महज 1650 करोड़ रुपये थी। बैंकों ने इतनी कम कीमत की गारंटी पर कंपनी को 10,000 करोड़ रुपये का कर्ज दे दिया जबकि बाकी के कर्ज के लिए विदेशी स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक ने मूल बैंकिंग एक्सेस कंपनी की संम्पत्ति की गारंटी रख ली।

अब कर्ज वसूली मुश्किलः

आमतौर पर दिवालिया कंपनी की संम्पत्ति को बेचकर उससे कर्ज वसूली की जाती है। लेकिन एयरसेल कंपनी के मामले में हिंदुस्तान की सरकार और बैंक दोनों के ही हाथ खाली हैं। क्योंकि एयरसेल के पास हिंदुस्तान में कोई अचल संम्पत्ति नहीं है। एयरसेल कंपनी का कोई टावर नहीं है। उसका कोई ऑप्टिक फाइबर नेटवर्क नहीं है। कोई इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। इस कंपनी ने नोकिया, एरिक्सन, जेडटीई कंपनी को अपनी सारी सेवाएं आउटसोर्स कर रखीं थीं।

वीएसएनएव के पूर्व सीएमडी बी के सिंघल का कहना है कि इस तरह के कर्ज की रिकवरी करना बहुत मुश्किल है। इस हालात में एनसीएलटी के पास ऐसा कोई उपाय नहीं दिख रहा जिससे कंपनी की संपत्ति को नीलाम कर बैंको और एयरसेल के देनदारों का पैसा चुकाया जा सके। आपको बता दें कि एयरसेल कंपनी भारत में पांचवें नंबर पर दूरसंचार का काम कर रही थी। 13 सर्किल में इस कंपनी के पास 2जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस थे लेकिन उस लाइसेंस की नीलामी के बावजूद कुल कर्ज और देनदारी का 10वां हिस्सा भी पूरा नहीं हो पाएगा।

एयरसेल कंपनी भारतीय बैंकों को बगैर किसी ठोस गारंटी के 10 हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज ले लिया। लेकिन एयरसेल कंपनी ने भारत में अपना कोई इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा नहीं किया। आज हालात यह है कि एयरसेल के लिए आउटसोर्स कर रही कंपनियां अपनी बकाया लिस्ट को लेकर लाइन में खड़ी हैं। इनमें एयरसेल के लिए काम करने वाली जीटीएल इंफ्रा कंपनी ने 912 करोड़ रुपये की मांग की है। इसके अलावा एक अमेरिकन टावर कंपनी ने 224 करोड़ रुपये की रिकवरी फाइल की है।

अगर दो कंपनियों के कर्ज की रकम रिकवर की जाए तो 1000 हजार करोड़ रूपये होती है। एयरसेल को साल 2010 में 20 साल के लिए 1650 करोड़ रूपये में 2जी स्पेक्ट्रम का लाइसेंस मिला था। लेकिन 8 साल बाद उस लाइसेंस की कीमत करीब 1000 हजार करोड़ रूपये से भी कम हो चुकी है।

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