संजू’ बनी राजू हिरानी की सबसे कमज़ोर फ़िल्म है…

संजू’ फिल्म का खलनायक कौन है…? राजू हिरानी के मुताबिक वह प्रेस, जो सूत्रों के मुताबिक या प्रश्नवाचक चिह्न लगाकर अफ़वाहों को ख़बरों की तरह पेश करता है. मीडिया से इस शिकायत को फिल्म में इतनी अहमियत दी गई है कि फिल्म का अंत बाकायदा एक गाने से होता है, जिसमें मीडिया का मज़ाक बनाया गया है. यह सच है कि मीडिया कई बार गैरज़िम्मेदार ढंग से पेश आता रहा है. वह कई बार अपनी ताक़त के नकली गुमान में रहता है. कई बार दूसरे ताकतवर लोग भी उसका यह भरम बनाए रखने में मददगार होते हैं. कई बार यह लगता है कि इन ताकतवर लोगों को ईमानदार नहीं, एक बेईमान मीडिया ही चाहिए, समझदार नहीं, सनसनी वाला मीडिया ही चाहिए.

इस मीडिया से संजय दत्त की शिकायतें भी जायज़ होंगी, लेकिन वे अधूरी शिकायतें हैं. सच तो यह है कि पूरा का पूरा मनोरंजन उद्योग – जिसमें हिन्दी फिल्में और उसके नायक-नायिकाएं भी शामिल हैं – मीडिया के इस सनसनी वाले तत्व का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करता है. वह उसे बढ़ावा भी देता है. उसे अपने अन्यथा जादूविहीन नायकों का जादू पैदा करने के लिए इस मीडिया की मदद चाहिए. उसे अपनी नायिकाओं का ग्लैमर दिखाने के लिए इस मीडिया की मदद चाहिए. मीडिया उसके खेल में साझीदार रहता है. वह उसकी खराब फिल्मों के प्रमोशन में भी मदद करता है. संकट तब पैदा होता है, जब यह मीडिया यह खेल अपने ढंग से करने लगता है. यह अनायास नहीं है कि जो अभिनेता कभी अपने संघर्ष के दौर में मीडिया के पीछे भागते रहते हैं – अपने स्टार होने के बाद सबसे ज़्यादा मीडिया से चिढ़ने लगते हैं. यह अमिताभ बच्चन से लेकर संजय दत्त तक का अंदाज़ रहा है.

लेकिन यह मीडिया और सितारों के बीच लुकाछिपी या चोर-सिपाही के खेल का मामला नहीं है. अभिनेता अभिनय दत्त की ‘बायोपिक’ होने का दावा करने वाली फिल्म ‘संजू’ दरअसल अपनी सुविधा से कई तथ्य चुनती है और कई नज़रअंदाज़ कर देती है. इस पर भी किसी को ऐतराज़ करने का हक़ नहीं है. किसी शख्स को यह हक है कि वह अपनी ज़िन्दगी के जिन हिस्सों को लोगों के सामने रखना चाहे, उन्हें रखे और बाक़ी को छिपा ले. लेकिन एक माध्यम के तौर पर किसी अच्छे सिनेमा के लिए संकट यहीं से शुरू होता है. जब आप बहुत सावधान क़दमों से ज़िन्दगियों की कटाई-छंटाई शुरू करते हैं, तो वे बेजान हो जाती हैं – उनका वह स्पंदन जाता रहता है, जो उनकी विडम्बनाएं भी बनाता है और विलक्षणताएं भी.

संजय दत्त की फिल्म के साथ भी यही हुआ है. इस फिल्म के सबसे अच्छे हिस्से वे हैं, जब वह ड्रग्स से जूझता दिखाई पड़ता है, क्योंकि यहां वह वाकई उस यथार्थ से मुठभेड़ कर रहा है, जो उसने जिया है. लेकिन जहां बाबरी मस्जिद और बाद के दंगों की कहानी शुरू होती है, जहां संजू के हथियार रखने, टाडा एक्ट में फंसने और छूटने और जेल जाने और जेल काटने की बात सामने आती है, वहां फिल्म कहीं कुछ स्थूल, कुछ नाटकीय और कहीं-कहीं कुछ नकली भी हो जाती है. इसके बाद अपनी समग्रता में यह फिल्म बाप-बेटे के भावुक रिश्ते की कहानी हो जाती है – बेटे की तकलीफ़ पिता के सीने में चुभती है, बेटे का अनकहा प्रेम पिता के सामने अनकहा रह जाता है. इन सबका असर यह हुआ है कि संजय दत्त के जीवन में दिलचस्पी की वजह से कमाई के रिकॉर्ड तोड़ने वाली यह फिल्म राजू हिरानी के करियर की सबसे क़मज़ोर फिल्म साबित हुई है. ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’, ‘लगे रहो मुन्नाभाई’, ‘थ्री इडियट्स’ या ‘पीके’ के मुकाबले ‘संजू’ कहीं नहीं टिकती.

मुश्किल यह है कि ‘संजू’ के सबसे कमज़ोर हिस्सों में एक विलेन ढूंढ़ने निकले राजू हिरानी मीडिया को सबसे आसान शिकार पाते हैं – यह भुलाते हुए कि मीडिया जो खेल करता है, उसमें बॉलीवुड की अपनी साझेदारी कम नहीं होती. दूसरी बात यह कि जैसे ‘संजू’ के बारे में राजू हिरानी ने मनचाहे तथ्य चुने हैं, वैसे ही मीडिया के बारे में भी चुन लिए हैं. जबकि सच्चाई यह है कि मीडिया जब खेल करता है, तो सुरक्षित रहता है, जब वह ख़बर करता है, तो ख़तरे में होता है. यह अनायास नहीं है कि ‘संजू’ के रिलीज़ होने से कुछ ही दिन पहले जम्मू-कश्मीर में एक पत्रकार को आतंकियों ने गोली मार दी और यह टिप्पणी लिखे जाने से कुछ पहले महाराष्ट्र पुलिस एक पत्रकार को खोज रही है, जिसने एक कार्यक्रम के लिए प्रेस क्लब की बुकिंग की थी. राजू हिरानी की सबसे बड़ी विफलता दरअसल यही है – ‘संजू’ देखकर न संजय दत्त के बारे में पूरी राय बनती है और न ही मीडिया के बारे में सच्ची राय मिलती है.

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